Sunday, April 5, 2026

धुआंधार!

Nabeel Gabol & Rakesh Bedi

नबील गोबोल बिचारा परेशान हो गया है, सफाई पेश करते करते! किस किस को बताए कि वो हिंदुस्तान का जासूस नहीं ! और न उसका दामाद वो अदृश्य आदमी जो पाकिस्तान में भारत के दुश्मन साफ कर रहा है। अरे भाई मसाला फिल्म है, कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं!  बस यही तो है वो बात जिसने इस फिल्म को मकबूल कर दिया। सत्य की कहानी के साथ बनी कॉकटेल! जबरदस्त!
 
चलो शुरू से बताता हूं। तो भैया मैने धर की धुरंधर नहीं देखी। थोड़ा बहुत जो सुना वो बहुत घिसा पिटा लगा। उस पर रणवीर सिंह भी इतना पसंद नहीं। मेरे न देखने से कोई फर्क नहीं पड़ता, फिल्म खूब चली। अब पार्ट 2 भी देखने का कोई इरादा न था। पर मेरी घर में कोई खास नहीं चलती। टिकट भी मेरे से ही बुक करवाई गई; गाड़ी भी मै ही चला कर ले गया। इसलिए बोलूंगा भी मै ही!
 
हाल लगभग पूरा भरा था, तो समझो अभी दो तीन हफ्ते नेटफ्लिक्स पर नहीं आएगी। पहले अच्छी अच्छी बातें बताता चलूं। फिल्म में सच को बड़ी सफाई से कहानी में मिलाया गया है। कहानी सच ही लगती है। कई पात्र असली शख्सियतों पर आधारित है जिन्हें दर्शक देखते ही पहचान जाते हैं। फिल्म में नवाज शरीफ और जरदारी है ,छोटे से रोल में। जरदारी के 10% कमीशन का जिक्र है। नबील गाबोल  जासूस है, जिसकी बेटी हमारे हीरो की बीबी है। भारत के NSA डोभाल का अहम रोल है।
सबसे अच्छी बात जो मुझे लगी कि फालतू की चुम्मा चाटी और ठूंसा हुआ रोमांस नहीं है। हीरोइन नई है, ठीक लगती है; जिसके करने को कुछ खास नहीं है।
 
फिल्म में बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई को कथानक में पिरोया गया है। बलोच खुश होंगे उससे। पाकिस्तानी आर्मी को भला बुरा कहा गया है। उनके बांग्लादेश में किए गए बलात्कारों और उनकी हार का कई बार जिक्र आता है। टेरेरिज्म से लड़ाई की बात है, पाकिस्तानियों से नहीं।
पाकिस्तानी थोड़े नाखुश रहेंगे पर देखो ये हुआ तो था।
 
नोट बंदी को कहानी में पिरोया गया और अतीक अहमद को ISI का गुर्गा बताया गया। यू पी  के इलेक्शन  में माफिया और ISI का साथ ऑपरेशन भी दिखाया है। ये वजह बनी सरकार विरोधी लोगों के फिल्म के प्रति नफरत की। मुझे ज्यादा प्रोपोगंडा जैसी समस्या नहीं दिखी।
देखो अतीक अहमद माफिया था; पुलिस प्रशासन सब उसकी जूती पर था! 500/1000 की करेंसी बंद हुई थी । चाय वाला प्रधान मंत्री बना था। फिल्म ने बस इसका उपयोग अपनी कहानी बताने में किया। जो नाराज़ हो तो वो घर बैठे! कोई जबरदस्ती तो दिखा नहीं रहा। टिकट कोई सस्ती है?
एक पाकिस्तानी दोस्त ने बताया कि रहमान डकैत इतना बड़ा कैरेक्टर नहीं था जितना फिल्म में दर्शाया गया है। दोस्त समझदार है, सही कह रहा होगा! उससे भी बड़ी बात है कि मुहाजिर कौमी मूवमेंट और कराची के राजा अल्ताफ हुसैन को कहानी ने छुआ तक नहीं। चलो!
 
फिल्म वैसे भी लंबी बहुत है ;चैप्टर पे चैप्टर। मेरे विचार में स्क्रिप्ट को थोड़ा और टाइट किया जाना चाहिए था। ऐसे लगता है नेटफ्लिक्स की 13 पार्ट की सीरीज एक साथ देख ली हो। निर्देशक का यह डिटेलिंग हो सकता है पर मुझे अति लगी। कैसे बताए; क्या बताए;  क्या छोड़ें; यही तो निर्देशन है। 
 
हीरो है, गोली लगती नहीं, चाकू से वो  मरता नहीं। बीबी को उसकी कई साल पता नहीं चलता कि ये मुसलमान नहीं। खतना, नमाज़, रोजा कुछ उसे दिखा नहीं! उसका अपना बाप इंडियन एजेंट है। गजब!  निर्देशक ने ये डिटेल क्रिएटिव लाइसेंस पर छोड़ दी।  ऐसा न हो तो फिर हिंदी फिल्म क्या होगी। अंत में हीरो अपनी गली के मुहाने से लौट आता है। इस पर थोड़ी बहस हो सकती है। क्यों? बहन के पति को मारा था; माँ पहचान न पाई तो नाराज़ हो गया; वो मरा रहेगा तो घर पैसा आता रहेगा...... थोड़ा  सा ओपन एंड है। दिमाग पे जोर लगेगा और ये ऐसी इंटेलेक्चुअल फिल्म नहीं है तो इस से एकदम झटका लगता है।
 
फिल्म में हिंसा धुआंधार है। कुछ लोगों को बहुत ज्यादा लगेगी। खास तौर पे कटते अंगों के दृश्य और कटे सर से फुटबॉल खेलने वाले सीन विचलित कर सकते है। पर भैया लियारी में पठान और बलोच की गैंग वार सच में थी/ है। हिंसा और खून खराब आम सी बात है। महात्मा बुध के जीवन पर ये कहानी नहीं बनी। फालतू का मीन मेंख नहीं न चाहिए!
  
और फिर  एक भारतीय होने के नाते कुछ मुस्कराहट आती है। काश ऐसे धुरंधर सच में हों जो आतंकवादियों को निपटा रहे हों। काश सच में दाऊद इब्राहिम को  रॉ ने स्लो पॉयजन दिया हो। थोड़ा विशफुल और फिल्मी  है !  पर फिर ये फिल्म ही तो है, क्यों?
 
रणवीर सिंह ओवर द टॉप , अतिरंजित एक्टिंग करता है, अब ये रोल ऐसा ही था तो चल गया। राकेश बेदी ने मौके का सही उपयोग किया। आर माधवन , अजीत डोभाल के रोल में जचते हैं। बाकी सब भी ठीक हैं। मेक अप आपको पसंद आयेगा। संगीत कुछ ज्यादा नहीं है। ABBA का रा रा रासपुतिन गाना बड़ी द्विअर्थी मायने में इस्तेमाल हुआ है। रा रा.... समझे? 

लो भैया लिखते लिखते टीवी पर पहली भी देख डाली। सारी बातें वही हैं; दूसरी थोड़ी बेहतर है। ऑस्कर फिर नहीं मिलेगा! पर बॉलीवुड ने स्पाई फिल्म के नाम पर आजतक जो कचरा कूड़ा परोसा है उसको देखते हुए कोई हैरानी नहीं कि इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस से इतना प्यार मिला। याद करें पाकी स्पाई और इंडियन स्पाई...प्यार...स्विट्जरलैंड में गाना...मिल के एक तीसरे बेनाम से दुश्मन का कूंड़ा..। 

उल्टी आती है; इतनी हिपोक्रेसी !

अलग से देखें तो ये दोनों 5/10 फिल्में  है। 4 घंटे फ़ज़ूल के पड़े हों तो एक बार आप देख सकते हैं। बस ये दुआ करें कि धुरंधर 3 न बने! हीरो की बीबी और बच्चा उधर नबील गाबोल के पास पाकिस्तान में रह गए है ! भगवान न करे भाई गड्डी लेकर, रस्ते में, सड़क पर, इक मोड़ से उधर निकल न पड़े। बहुत ज्यादा हो जाएगा !!