Friday, July 10, 2026

आटे दाल का भाव!


old ration shop

स्वर्णा चक्की फ्रेश आटे का  बीस पाउंड का बैग कब बारह डॉलर से उन्नीस का हो गया पता ही नहीं चला। यूं तो पहले भी ये दो इक डॉलर महंगा ही था औरों के मुकाबले ; पर अब सरासर चुभ रहा है! ला हम फिर भी वही रहे हैं। कोई रोटी खाना तो बंद नहीं न हो सकता! फिर ऐसे वैसे कोई भी आटा नहीं चलेगा। छोटी मोटी बातों को दिल पे लगाएंगे तो जियेंगे कैसे? यहां तो जीने के लिए बड़े बड़े गहरे दाग भी सबकी नज़र बचा के जिगर में छुपाये मुस्करा रहे है।

पर देखो अगर पेट भरा हो, सिर पर छत और बदन पे कपड़ा हो फिर भी कोई कितना लालच करे, इसकी कोई सीमा है कि नहीं। अपने पे नज़र डालूं तो कई बार कई लोगों को कभी मज़ाक़ में कभी कुछ इर्ष्या से कहते सुना है, "अरे ये तो लेक्सेस में चलते हैं"! मुझे इसमें कुछ खास बात नहीं लगती। लेक्सेस कौन सी रोल्स रॉयस है? मुझे  तो डेढ़ लाख डॉलर की मर्सिडीज जी वैगन पसंद आ रही है। तो क्या करूं इस लालच के लिए? नशा बेचना शुरू कर दूं क्या? 

यही पर मानसिक संतुलन; कमिटमेंट; मोरालिटी; सेल्फ कंट्रोल और एथिक्स की  आजमाइश शुरू होती है। मेरा मानना है कि कोई भी हर एक मोर्चा जीत नहीं पाता। लालच  और हवस की रस्ते  रस्ते रोक टोक है। पर खुद को सस्ते में पूरा का पूरा बेच डाले जो; थोड़े लालच के लिए, उसको क्या कहें! हैं कुछ लोग और मेरी बदकिस्मती से मेरी पहचान के ! वैसे इस मुद्दे पर सिर्फ वर्षों से मै ही अपना जी जला रहा हूं, वो अपना वजूद  हार के भी खुद को जीता हुआ समझते है! दूर कहीं अपनी दुनिया में खुश है! खुश रहें।

चाहे तो इसे हम एक ईश्वरीय माया कहें , चाहे सत्य,  पर सीता माता ने लक्ष्मण रेखा लांघी ! क्या हुआ? सोने का हिरण मिला? मिलता कैसे, ऐसा कुछ होता ही नहीं! फ़िर मिला क्या ? लांछन और विरह मिला! फिर धरती में समा जाने का भाग्य मिला ! कुछ सीखते हम इस कथा से पर हम हैं कि भागे चले जा रहे हैं किसी न किसी स्वर्णमृग के पीछे पीछे; हर लक्ष्मण रेखा लांघते हुए ! 

मैं ये कभी न कहूंगा कि पैसा बुरी चीज़ है। मसला यहां आता है कि कितना और कैसे। शास्त्रों ने समझाया है मनुष्य जीवन का लक्ष्य। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष !  आसान शब्दों में कहे तो अपना कर्म सही नियम से करके  पैसा कमाओ। उससे मौज मस्ती भी करो और प्रभु में लीन हो जन्म मरण के चक्रव्यू से मुक्त हो! तो देखा न पैसा कमाना बुरा नहीं , उसका उपयोग भी शास्त्र सम्मत है। बस धर्म अनुसार यानि नियमानुसार हो तभी तो मोक्ष भी प्राप्त होगा। वरना लालच ने तो ले डूबना है ही!

सुनो भाई अब कोई बाबर लुटेरा मंदिर लूटने फरगना से नहीं आता। हम लोग काफी हैं ! अब समझ आया क्यों 500 साल श्रीराम मंदिर नहीं बन पाया।  धोखा देने में ज़रा भी हिचक नहीं है बस अपना फायदा होना चाहिए! गद्दार बनने का कोई  मौका मिले तो सही, किसी की भी पीठ में खंजर उतार दें। मंदिर की दान पेटी से चोरी करना कौन सी बड़ी बात हो गई! हुआ क्या अगर जीवन भर का दाग लग गया? तीन मंजिला मकान तो बन गया! इज़्ज़त गई तो गई ,पैसा तो आया! ग़द्दार हुए तो क्या हुआ, अपना फायदा था लपक लिया! क्या होता है भक्तों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना? जाने किस बात का शोर  मचा रखा है ?

वो गाना सुना है ना ,"देते हैं भगवान को धोखा, इंसा को क्या छोड़ेंगे। कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या। कोई किसी का नहीं है पगले...."  लानत है उनके इस जीवन पर। मंदिर के द्वार पर इज़्ज़त से जीवन यापन का सुअवसर मिला था पर उन्होंने धोखेबाज़; गद्दार; चंदा चोर बनना चुना!

मैकेंजी स्कॉट का नाम सुना होगा।  ये शायद कभी किसी मंदिर में न गई होंगी। कोई पूजा पाठ नहीं करती होंगी। कभी ऐमजॉन के संस्थापक जेफ बोज़ोस की पत्नी थी। दानवीर हैं; लेखिका हैं। अमेजन के 1.3% शेयर अभी भी इनके पास है। दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में से एक हैं। इनके पास लगभग 40 बिलियन अमेरिकी डालर  की संपत्ति है। साल 2025 तक अपनी संपति में से 26.2 बिलियन डॉलर दान कर चुकी थी। अभी तक रुकी नहीं हैं। कभी समय निकाल कर देखना एक बिलियन में कितने जीरो लगते हैं। और 26.2 से उसको गुणा कर देना। फिर 95 से उस रकम को गुणा करोगे तो रुपये में जो नंबर आयेगा गिन न पाओगे! मुँह खुला का खुला रह जाएगा!

कबीरदास जी कह गए हैं," साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाये।। नहीं चाहिए एक इंसान को बेइन्तहा पैसा। अच्छा कर्म कमाओ। इस विदेशी महिला ने बता दिया धर्म, अर्थ , काम का क्या मतलब होता है। इन्हें मोक्ष कम से कम मुझ से तो पहले प्राप्त होगा। 

सब कुछ पैसे में तौलना बहुत महंगा पड़ता है। फिर ये हम पर निर्भर करता है कि पैसा हमे हमारी औकात दिखा देता है या कि हम पैसे को उसकी औकात बताते है। मैकेंजी स्कॉट की तरह हम भी बताएं पैसे को कि बस तुम दो रोटी की हैसियत रखते हो। आटे दाल की तरह मेरे चरित्र का भाव नहीं लगता; मेरी वफ़ा अनमोल है। मेरा वचन बाजार में नहीं बिकता! मेरा कर्म और कर्तव्य पैसे के परे है !

गाड़ियों की दुनिया का एक कॉन्सेप्ट है ,'lifetime ownership cost'. मतलब ये कि एक गाड़ी 15/ 20 साल चलती है तो कितना खर्चा खायेगी। आम तौर ये माना जाता है कि जापानी गाड़ियों का रख रखाव सबसे कम  और जर्मन गाड़ियों का खर्च सबसे अधिक होता है। टोयोटा की गाड़ी फोक्सवैगन की गाड़ी से महंगी मिलती है पर लोग फिर भी टोयोटा लेते हैं। पता है कि सालों साल जिंगा ला ला रहेगा। फोक्सवैगन आज कुछ बचवा देगी पर 2/4 साल में ही खर्चा करवाएगी और फिर बहुत खर्च करके भी मुफ्त में तंग करती रहेगी।

कर्म का भी कुछ ऐसा ही है। सद्कर्म करते समय उलझन होती है; महंगा लगता है; मुश्किल लगता है। पर ये सारा कुल जमा सबसे सस्ता पड़ता है, जीवन भर आराम से चलता भी है। दुष्कर्म बस करने में आसानी है! उस वक़्त फायदा भी दिखता है। कुछ मिलता भी है! बाद में सारी उम्र की परेशानी, निराशा और ग्लानि से निबटो!

सो स्वर्णा आटा लिया करें। महंगा जरूर है ; सब जगह मिलता भी नहीं पर सेहत के लिए बेहतर है।  एडेड शुगर  0% है। दूसरे आटे बताए बगैर 3% चीनी आपको खिलाते हैं! नमक और चीनी कम से कम रखेंगे तो सुखी रहेंगे।

सोचा आज शनिवार को आपको आटे दाल  का भाव ही बता दूं!







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