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Monday, September 8, 2025

बातूनी!

representative graphic

इक गुज़रे ज़माने में  कुछ था  जो वो था;
कुछ हुआ ही न होता तो क्या बात करते?

इस लंबी खामोशी ने जो दूरियां बढ़ा दी हैं;
मिलते तो आंखे कहती, और क्या बात करते?

कितने तुम्हारे राज़ इस दिल में दफन हैं;
सब कुछ भी गर बताते,तो क्या बात करते?

हर बात  बतानी थी, सुनते तुम्हारी हर पल ;
 सिलसिले सब तुमने तोड़े ; फिर क्या बात करते?
 
 है तुमसे ये छुपाया, इक ही है दोस्त अपना; 
उसने भी कब निभाया, फिर क्या बात करते?

किस आसानी से तुमने मुझको दिए हैं धोखे; 
हम ये ही भूल जाते तो क्या बात करते?

"खुश हो न तुम"; बस इतना सा पूछना था;
इतनी सी बात करते; फिर क्या बात करते?

 माला फेरने की उम्र में हम; जाने किस साल पे रुके हैं!
दुनिया के शोर ओ गुल में फिर क्या बात करते?





Monday, June 16, 2025

हम क्या चाहते हैं ?


 

Couple in front of Gustav Klimt's iconic "Der Kuss". 

Belvedere Museum, Vienna

मेरे बालों में उंगली फिराने के बहाने 

अचानक ज़रा सा खींच दो,मजाक में 

मै ये चाहता हूं! 

 

तुम बालों में ब्रश करो सोने से पहले

और मैं रोज़ एकटक ,मंत्रमुध देखूं ।

 मै ये चाहता हूं!

 

"काफी कड़वी लगती है? यू आर ए किड"

कह के खूब कहकहे लगाओ मुझ पर  

मै ये चाहता हूं!

 

तुम कालेज के बारे में सवाल पूछो,

जो अभी हुए ही नहीं उन बच्चों के। 

मै ये चाहता हूं!

 

तुमको नहीं आता बोल चाइनीज तुम ऑर्डर करो

घर पर किसी दिन दोनों के लिए मैगी से काम चलाओ

 मै ये चाहता हूं!

 

भीगी भीगी आंखों से अपने राज़ मुझे बताओ

मेरे थोडे शरारती जोक पर आँखें भींच हंसो

मै ये चाहता हूं!

 

हम फिल्म देखने जाएं और टिकट ही न मिले। 

 मेरा कुछ सामान तुम्हारी कपड़ों की अलमारी में मिले 

मै ये चाहता हूं!

 

सुस्त ट्रेन की ऊपरी बर्थ पर बतियाएं हम

तिब्बती मार्केट से मेरा स्वेटर खरीदो तुम

मै ये चाहता हूं!

 

 लालची हूं  इसलिए सारी दुनिय़ा के बदले , 

 मुनाफे का सौदा - तुम्हे मांगता हूं!

मै ये चाहता हूं! 

 

 तुम  फिर भी चाहती हो आज़ादी!

हां, मुझसे चाहिए हां, अभी चाहिए !


रहने दो ,आज से मै कुछ नही  चाहता !





Sunday, June 8, 2025

वादा, मेरा वादा!


'Samurai under Attack'
Antique Japanese Ukiyo-e woodcut print

नए नाम के नए रंग में बरसों बाद तुझे देखकर,

रूह तक के दुखते ज़ख्म बेदर्दी से खुरचे गए फिर।

डूबते दिल को भरोसा दिया इस सच ने सामने आकर,

अब भी वैसी की वैसी है तेरी, हिकारत भरी वो नजर।

जीवन भर के साथ का उधार बकाया है तुझपर,

तकाज़ा करने आया कभी कोई क्या तुम्हारे दर?

कर्ज वापिस हो कैसे,क्यों, क्या करोगी सोचकर,

तुम जियो जिंदगी गुलाबी, मखमली; बेफिक्र होकर।

मै हूँ,रख लूंगा सारी तल्खियां अपनी नाकामी में सहेज कर,

बता क्या करूं, ये वादा कर जो दिया था तुझपे ऐतबार कर!

तुम अपनी चुप से कहती चलो, 'मरदूद चुप कर',

ढीठ हूँ, हवाओं से तेरी लेता रहूंगा खोज खबर।

इस मूर्ख को समझाया था डूबता सौदा मत कर,

चलो दो, अगली बार के लिए कोरा कागज़ दस्तख़त कर।

एवज में समय के अंत तक मांगूंगा ,'प्रभु इसका भला कर',

या कि फिर वादा खिलाफी करोगी, अख्तियारों का पत्ता चल कर?

अपनी भली खबर भेजो, दो अक्षर हाल लिख डालो। ...बस मुक्तसर

मेरी वफ़ा है बस अक्स तेरा; इसी हिकमत से फिर तेरे साथ रहूंगा उम्र भर,

बता क्या करूं? ये वादा कर जो दिया था तुझ पर ऐतबार  कर!





Saturday, May 31, 2025

उससे कहना! USSAY KEHNA!

 

 

 "An old man talking" Etching by Salvatore Rosa

 उससे कहना!

घर के उसका मुझको पता है,

हर इक रास्ता नप रखा है। 

उस दुनिया से चल भी बसा हूं।

जाने क्या मै सोच रहा हूं।

मिले तो उससे लाज़िम कहना;

मै बस उसको  ढूंढ रहा हूं।

 

सख्त लफ्ज़ से दूर रहूंगा;

अपना हक पर लेके टलूंगा।

"खुश तो हो तुम"?,

ये सवाल पूछने सदियों से ,

मैं बस उसको ढूंढ रहा हूं।

मिले तो उससे लाज़िम कहना।

 

मेरी दुनिया तुम में थी बस;

वो ही दुनिया लूट लुटाकर,

कब्र पे मेरी ताज बनाकर 

सौदा सस्ता पड़ा कि महंगा?

और फ़ज़ूल की बात बनाने 

मैं बस उसको ढूंढ रहा हूं।

मिले तो उससे लाज़िम कहना। 

 

गली मुहल्ले, चौक के रस्ते,

हर दिन, हर पल जगते सोते;

हर इंसा में, हर पत्थर में; 

हर कांटे को हाथ चुभा कर; 

मै बस उसको ढूंढ रहा हूं।

मिले तो उससे लाज़िम कहना।

 

आदमी शरीफ़ है तो पुल से कूदे!

कन्या राशि का कमबख्त है;

कुछ पल रोया, निकल लिया फिर सब्जी लेने। 

बाकी का आके रो लेगा!

बहुत प्रैक्टिकल है अपना भाई;

अच्छा किया जो जान छुड़ाई। 

इस सब से सहमत होने को 

मैं बस उसको ढूंढ रहा हूं। 

मिले तो उससे लाज़िम कहना।

 

गम को लफ्जों में ढालो तो

जाम ए जहर इक बन जाएगा।

किसी शाम फिर बैठें सामने,

पीने पिलाने, इसी बहाने,

मैं बस उसको ढूंढ रहा हूं।

मिले तो उस से लाज़िम कहना।

 

पुनर्जन्म गप्प नही है सारी; 

बस पे चढ़ने न दूंगा इस बारी!

जनम लगें जितने लगने दो; 

थाली भर के, ठूंस के लूंगा!

हां दो ही निवाले नहीं चलेंगे! 

ऐसा ज़रा सा धमकाने को,

मैं बस उसको ढूंढ रहा हूं।

मिले तो उससे लाज़िम कहना।

 

बिसात है क्या दुश्मन की जो दे 

सच्चे दोस्त के बक्से में ही,

बस पहली दूजी  ही तह में;

दगा पड़ा खा मिलेगा! 

भूली कसमें होंगी, टूटा वादा दिखेगा । 

इत्ता ज़रा छिपाना कि

अपने फायदे का फलसफा सिखाने, 

मै बस उसको ढूंढ रहा हूं।

मिले तो उससे लाज़िम कहना।


आखिरी शब को, आखिरी लम्हे;

 कान लगा के गौर से सुनना।

जाते जाते यही कहूंगा;

मै बस उसको ढूंढ रहा हूँ!

उससे कहना! 

उससे कहना!

 






Friday, May 30, 2025

लाल फूल के पीछे! Lal phool ke peeche!

 

 

                                                   'Poppies'  by Vincent Van Gogh

सिर पटको वो कहीं नहीं है; जो दिख भी रही है।
सदियों हुए वो मर भी चुकी है; और दिख भी रही है।
 
फर्क है देखो नाम के हिज़्जे; जो दिख भी रही है।
सुनो अलग कबीले की है; जो दिख भी रही है।
 
लाल फूल के पीछे छिपी है; और दिख भी रही है।
कांटों से क्या खूब सजी है; जो दिख भी रही है।
 
पड़े हैं ताले दरवाजों पे, और दिख भी रही है।
खिड़की गुम है दीवारों की; और दिख भी रही है।
 
पर्ची, चिट्ठी नहीं न लेगी; जो दिख भी रही है।
फरियाद कोई नहीं सुनेगी; जो दिख भी रही है।
 
छिपन छिपाई खेल रही है; और दिख भी रही है।
धप्पा तुमको नहीं कहेगी; और दिख भी रही है।
 
यूं ही अकेली खड़ी रहेगी; जो दिख भी रही है।
तुमसे दूरी बना रखेगी; जो दिख भी रही है।
 
कबका विदा वो कह जो चुकी है; और दिख भी रही है।
कब्र में तुम जो दफन पड़े हो; और दिख भी रही है?
 
Roman script follows:- 
 
Sir patko vo kahin nahi hai; Jo dikh bhi rahi hai.
Sadiyon pehle mur bhi chuki hai; aur dikh bhi rahi hai.
 
Farak hai dekho naam ke hijje; Jo dikh bhi rahi hai.
Suno alag kabile ki hai; Jo dikh bhi rahi hai.
 
lalaphool ke picche chipeei hai; aur dikh bhi rahi hai.
kaanton se kya khoob saji hai;Jo dikh bhi rahi hai.
 
pade hain taale darwajon pe, aur dikh bhi rahi hai.
Khidki gum hai deewaron ki; aur dikh bhi rahi hai.
 
Parchi chiithi nahi n legi; Jo dikh bhi rahi hai.
Fariyad koi nahi sunegi; Jo dikh bhi rahi hai.
 
Chipan chupai khel rahi hai; aur dikh bhi rahi hai.
Dappa tumko nahi kahegi; aur dikh bhi rahi hai.
 
yoon he akeli khadi rahegi; Jo dikh bhi rahi hai.
Tumse doori bana rakhegi; Jo dikh bhi rahi hai.
 
Kabka vida vo keh jo chuki hai; aur dikh bhi rahi hai.
kabr tum jo dafan pade ho ; aur dikh bhi rahi hai?

 

 

 

Friday, March 14, 2025

आख़िर क्यों ? Akhir Kyon ? ( Why, Why ?)

AI generated Image of a baby using Bing
 
जिन्दगी  का अपनी , तमाशा देखते हो क्यों ?
राब्तों से , सोहबतों से भागते हो क्यों ?
 
मायूसियों का खुद एक खज़ाना है जिंदगी ,
अपनी शिकस्तों  का सिला फिर मांगते हो क्यों ? 

माथे पे त्योरियां हमे अच्छी नहीं लगती,
अपनी  मुस्कानो  को हम  से छीनते हो क्यों ? 
 
 लबों से कुछ कहो; चाहे कुछ भी हमे कहो , 
बस निग़ाहों से सख्त सवाल पूछते हो क्यों ?
 
लाते  कहाँ से हो  तुम इतने शोर की चुप्पी ?
कुछ लफ्ज़ खर्चने में बला  झिझकते ही हो क्यों ?
 
यूँ शुक्र है कि रूख पे तुम्हारे तिल ही नहीं है ,
गालों के *हिलकोरे का अज़ाब कम मानते हो क्यों ?
 
यूँ दूर से दीदार से महरूम क्या हुए ,
 ख्वाबों में भी विसाल से पलटते ही हो क्यों ?
 
मुँह फेरने की आदत ने तुम्हारी ,  बेचैन कर दिया ,
हामी नहीं भरी फिर ना कहने से बचते फिरते हो क्यों ? 

*हिलकोरे (डिम्पल , गाल का गड्डा  )
 
Text in Roman follows
 
Jindgi ka apni, tamasha dekhte ho kyon ?
Rabton se , sohbaton se bhagte ho kyon ?
 
Mausiyoon ka khud aik khazana hai jindgi ,
Apni shikaston ka sila fir mangte ho kyon ? 

Mathe pe tyoriyan hume acchi nahi lagti,
Apni muskano ko himse chhente ho kyon ? 
 
Labon se kuch kaho; chahe kuch bhi hume kaho , 
Bus nigahon se sakht sawal poochte ho kyon ?
 
Latey kahan se ho tum itne shor ki chuupi ?
Kuch lafz kharchane me bala jijhakte he ho kyon?
 
Yun shukr hai ki rukh pe tumhare til hi nahi hai ,
Galon ke *hilkoray ka azab kum mantey ho kyon ?
 
Yoon door se didar se mahroom kya huay ,
Khwabon me bhi visal se palattey hi ho kyon ?
 
Muh ferne ki adat ne tumhari,  Bechain kar diya ,
Hami nahi bhari fir na kehne se bachte firte ho kyon ?
 
*hilkoray(dimple)