Friday, November 2, 2018

इकबालिया बयान ! Iqbaliya bayan !

"Gypsy Caravan" etching by Augustus Edwin John
ये हाल तब है कि जब पास कुछ नही ;
कारवां लुटने का है एहसास ,  क्या करें ?

ये जिंदगी है एक स्याह रात क्या करें;
हैं किसके और भी यूं हालात ,क्या करें ?

हर शख़्स उठा फिर रहा है अपना ही सलीब ;
कोई हमें तख़्ते से उतारे कि क्या करें ?

बेबाक बोलने की सज़ा मिलती है ज़रूर ,
सदियों से है दस्तूर ये। इंसाफ क्या करें ?

शकों के दायरे में हो तुम पहले ही दिन से ;
खूं से भी कब गिरेगी ये दीवार , क्या करें ?

इक जुर्म मेरा ये है कि ख़ुद पे यकीं किया ;
है उम्र भर का धोखा ;अब आज क्या करें ?

वक़्ते करीब मोमिन हुए जा रहे हैं लोग ;
हम शुबह न करें तो फिर और क्या करें ?

भागें कहाँ , जाएँ कहाँ ; कैद ए  जहाँ से हम ;
इन बेड़ियों में खुश हैं;फरियाद क्या करें ?

"इतनी हसीन  इतनी जवां रात क्या करें" के रचयिता  साहिर लुधयानवी  से माफ़ी !  

Roman text follows:-

Ye haal tab  hai ki jab pas kuch nahi ;
Caravan lootne ka hai ahsas , Kya karen ?

Ye jindgi hai aik syah raat, Kya karen;
Hain kiske aur bhi yoon haalat ,Kya karen ?

Hr shakhs utha fir raha hai apna hi saleeb ;
Koi hame takhte se utare ki Kya karen ?

Bebak bolne ki saza milti hai jaroor ,
Sadiyon se hai dastoor ye. Insaaf Kya karen ?

Shaqon ke dayre me ho tum pehle hi din se ;
Khoon se bhi kb giregi ye deewar , Kya karen ?

Ik jurm mera ye hai ki khud pe yakin kiya ;
hai umr bhar ka dhikha ; ab aaj Kya karen ?

Waqt e kareeb momin huay ja rahe hain log ;
Hum shubah na Karen to fir aur Kya karen ?

bhage kahan , Jayen kahan ; kaid a jahan se hum;
in bediyon me khush hain; Fariyad Kya karen ?


With apologies to Sahir Ludhyanvi; the poet that wrote "Itni hasin , itni Jawan raat kya Karen"!






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